परिचय: उत्तरकाशी में एक और बादल फटने की घटना
Cloudburst in Uttarakhand मंगलवार को उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में हुई बादल फटने की घटना ने एक बार फिर पहाड़ी क्षेत्रों की नाजुक जलवायु और वहां के निवासियों की चुनौतियों को उजागर कर दिया। धाराली और सुखी टॉप जैसे ऊंचाई पर बसे गांवों में भारी तबाही देखने को मिली। ये घटना मानसून के मौसम में उत्तराखंड में लगातार हो रही मौसमीय विपदाओं की श्रृंखला में ताजा कड़ी है।

मैं खुद उत्तराखंड गया हूं और मैंने देखा है कि कैसे छोटी सी बारिश भी पहाड़ों में बड़ी आफत बन जाती है। जब बादल फटते हैं, तो वह सिर्फ बारिश नहीं होती, वह तबाही लेकर आती है – वो भी अचानक और बहुत तेज़।
Cloudburst Cloudburst in Uttarakhand आखिर होता क्या है?
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, जब किसी इलाके में एक घंटे के भीतर 100 मिलीमीटर से ज्यादा बारिश होती है, तेज़ हवाओं और बिजली कड़कने के साथ, तो इस तरह की घटना को ‘बादल फटना’ कहा जाता है। आमतौर पर ये घटनाएं सीमित क्षेत्रफल (लगभग 20-30 वर्ग किलोमीटर) में होती हैं, लेकिन असर आसपास के गांवों तक महसूस होता है।
हालांकि, IIT जम्मू और राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान, रुड़की के 2023 के एक रिसर्च पेपर के मुताबिक, बादल फटने की परिभाषा कुछ और गहराई से दी गई है –जब बेहद छोटे इलाके – लगभग एक वर्ग किलोमीटर के दायरे में – कुछ ही मिनटों में 100 से 250 मिलीमीटर तक बारिश हो जाती है, तो इसे बेहद तेज़ और केंद्रित बारिश माना जाता है। यह बरसात इतनी सीमित जगह पर और इतनी तेजी से होती है कि संभलने का मौका तक नहीं मिलता।
क्यों उत्तराखंड जैसे पहाड़ी इलाके ज़्यादा प्रभावित होते हैं?
हिमालयी क्षेत्र, खासकर उत्तराखंड, मौसम से जुड़ी चरम घटनाओं जैसे कि बादल फटना, भूस्खलन, बर्फीले तूफान और भारी वर्षा के प्रति बेहद संवेदनशील हैं। इसका कारण है इन क्षेत्रों की भौगोलिक बनावट – ऊँचे-नीचे पहाड़, तंग घाटियां और अस्थिर चट्टानें। उत्तरकाशी, जहां हाल की घटना हुई, समुद्र तल से लगभग 1,160 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, जो बादल फटने की ‘खतरे की रेंज’ 1,000 से 2,000 मीटर में आता है।
इसीलिए बादल फटना जैसे हादसे यहां आम होते जा रहे हैं, और इनके प्रभाव भी बहुत गंभीर होते हैं।
जलवायु परिवर्तन से कैसे जुड़ा है ये खतरा?
अब सवाल उठता है – क्या ये घटनाएं पहले भी इतनी होती थीं?
उत्तर है – नहीं।
पिछले कुछ वर्षों में, वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों ने साफ तौर पर देखा है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से इस तरह की घटनाएं बढ़ रही हैं। गर्म होती धरती और बदलता मानसून चक्र, दोनों मिलकर उत्तराखंड जैसे क्षेत्रों में इन आपदाओं की संभावना बढ़ा रहे हैं।
जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, हवा में नमी की मात्रा भी बढ़ती है। यही नमी जब अचानक किसी एक क्षेत्र में गिरती है, तो वह बादल फटने जैसी घटनाओं का रूप ले लेती है।
असल घटनाएं जो सोचने पर मजबूर करती हैं
👉 26 जुलाई, 2025: रुद्रप्रयाग जिले में भारी बारिश के बाद भूस्खलन हुआ और केदारनाथ यात्रा का मार्ग बाधित हो गया। 1,600 से अधिक यात्रियों को तुरंत वहां से निकाला गया।
29 जून, 2025: बरकोट-यमुनोत्री सड़क मार्ग पर स्थित सिलाई बैंड के पास अचानक भारी बारिश और पानी का बहाव हुआ। बताया गया कि वहां एक निर्माणाधीन होटल स्थल था, जो तेज़ पानी की चपेट में आ गया। इस हादसे में आठ से नौ श्रमिकों के लापता होने की खबरें सामने आईं, जिससे पूरे इलाके में चिंता का माहौल बन गया।
इन घटनाओं से साफ पता चलता है कि यह सिर्फ मौसमीय घटनाएं नहीं, बल्कि जीवन और आजीविका से जुड़ी गंभीर समस्याएं हैं।
नुकसान की तस्वीर: घर, सड़कें और ज़िंदगी
जब बादल फटते हैं, तो उसके तुरंत बाद कई असर देखने को मिलते हैं –
- घर गिर जाते हैं,
- सड़कें टूट जाती हैं,
- बिजली-पानी की सप्लाई बंद हो जाती है,
- यातायात पूरी तरह ठप हो जाता है,
- और सबसे दुखद – इंसानों की जानें जाती हैं।
उत्तरकाशी की इस ताज़ा घटना में भी यही सब हुआ। ऊंचाई वाले गांवों जैसे धाराली और सुखी टॉप में सैकड़ों लोग प्रभावित हुए। खेत बह गए, घरों में पानी भर गया, और बचाव कार्यों में भारी चुनौती आई।
व्यक्तिगत अनुभव: जब मैं यमुनोत्री गया था…
कुछ समय पहले मेरी यमुनोत्री यात्रा के दौरान एक अनुभव ऐसा हुआ जिसे मैं कभी भूल नहीं सकता। उस शाम आसमान पूरी तरह साफ था, लेकिन रात के करीब एकाएक मौसम पलटा और घने बादल उमड़ आए। थोड़ी ही देर में बारिश तेज हो गई और कई घंटे तक लगातार बरसती रही। एक स्थानीय बुजुर्ग व्यक्ति ने मेरी ओर देखते हुए कहा, “लग रहा है ऊपर किसी जगह खूब पानी बरसा है, कुछ अनहोनी तो नहीं हुई?” अगली सुबह खबर आई कि पास की सड़कें बह चुकी हैं और कुछ छोटी दुकानें भी कीचड़ और मलबे में दब गई हैं।
क्यों ज़रूरी है बेहतर प्लानिंग और नीति?
2023 के अध्ययन में यह बात दोहराई गई है कि देश और दुनिया के स्तर पर ऐसी घटनाओं के लिए ठोस नीति बनाना बेहद ज़रूरी है। अभी तक जो तैयारी है, वह काफी हद तक प्रतिक्रियात्मक (reactive) है – यानि हादसा हो जाने के बाद राहत भेजना। लेकिन असल ज़रूरत है – पूर्व योजना और चेतावनी तंत्र की।
विशेषज्ञों का मानना है कि:
- हाई-रिस्क ज़ोन की पहले से पहचान हो,
- सटीक मौसम पूर्वानुमान और स्थानीय चेतावनी प्रणाली हो,
- निर्माण कार्यों के लिए वैज्ञानिक आधार पर गाइडलाइंस हों,
- और स्थानीय समुदायों को आपदा प्रबंधन की ट्रेनिंग दी जाए।
निष्कर्ष: ये सिर्फ ‘प्राकृतिक’ घटनाएं नहीं, चेतावनी हैं
उत्तरकाशी की यह घटना हमें यह याद दिलाती है कि जलवायु परिवर्तन सिर्फ तापमान बढ़ने की बात नहीं है – यह हमारे जीवन के हर हिस्से को प्रभावित कर रहा है। पहाड़ों में रहने वाले लोगों के लिए तो यह रोज की चुनौती बन चुका है। ज़रूरत है, हम इस खतरे को गंभीरता से लें, नीतियों में बदलाव करें और आने वाले समय के लिए बेहतर तैयारी करें।
अगर हम अब भी नहीं चेते, तो आने वाले सालों में उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग और चमोली जैसे जिले हर साल किसी नई आपदा का नाम बन सकते हैं।
आपका अनुभव क्या है? क्या आपने कभी बादल फटने जैसी कोई घटना देखी या सुनी है? अपने विचार नीचे ज़रूर साझा करें।